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मजबूरी को नियति का नाम ना दे…

मजबूरी को नियति का नाम ना दे,
अपनेआप को बेचारगी का फ़रमान ना दे…
क़िस्मत में क्या है क्या नहीं,
इसका फैसला क़िस्मत के हाथ ना दे…
ख़ुद बढ़कर लिख अपना अफ़साना तू,
कह दे क़िस्मत से आकर अपना इनाम ले !!

माना हाथ बड़े हैं समय के, मग़र
समय के हाथों में अपना हाथ दे…
फहरा दे अपना विजय ध्वज तू,
बहती हवा का साथ दे…
देख ज़रा घनघोर घटाएँ काली,
छाएँ जब तब इसने ठानी…
सर अपना ऊँचा कर चल तू भी,
डरता क्यों तू, अपना अधिकार ले !!

मान मत चाहे नियम और धर्म कोई,
पर अपनी डोर अपने हाथ ले…
चुपचाप सा मन कहता है,
कलरव को आवाज़ दे…
कहाँ है वो हिम्मत, वो मति,
ढ़ूँढ़ ज़रा अपनेआप को खंगाल ले…
कर कोशिश तू अविचल,
जीवन को नया आयाम दे…
मौत ना आने पाए उस पल तक,
जब तक ना स्वयं को तू स्वीकार ले !!

#रshmi

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औक़ात…

कपड़ा नहीं तो ना सही, रोटी नहीं तो कोई बात नहीं…
मग़र सोचो नहीं के उनकी कोई औक़ात नहीं…

ये देखो ज़रा औक़ात अपनी, कर लो तुलना उनसे अपनी..
दिल तो बड़ा उन्हीं का है जी, कारण कष्ट है जो उन्होंने सहा वही..

घर हैं मग़र चैन की नींद नहीं नसीब तुम्हें,
आसमान से सूकून की आबो-हवा है बहती..
तुम देखकर मेवा-मिश्री मुँह बनाते फिरते,
भूखे हैं वो, उन्हें भूख निकालने की अदा आती है जी…

तुम परेशान हो देखकर के कैसे ये इतने संवेदनशील हैं फिर भी,
यही इलाज है इनका, यही उनकी पीर है जी…
करार कहाँ आता है इंसान को किसी भी हाल में,
बेहाली चाहिए, बेकरारी चाहिए दिल के मलाल में…

जीना सीखना हो तो फ़कीरी सीखा देती है,
मरने का हुनर भी ग़रीबी सीखा देती है…
अमीरी तो अच्छी है ही,
मग़र औक़ात सबकी एक सी है जी !!

#रshmi

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इश्क़ किया नहीं यूँ ही मैंने…

चाहा था जिसे अपने लिये,
जो हमने गुज़ारा था,
लम्हा मेरा, हर वो तुम्हारा था…
इश्क़ किया नही यूँ ही मैंने,
हाल-ए-दिल मेहरबान भी था…

तू फ़साना मोहब्बत का,
तू तराना धड़कन का…
तू नूर है,
मैं शमा सी जल जाऊँ…
तू स्याही पिया,
मैं रंग- रंग जाऊँ…
तू चँदा,
तुझसे रोशन घर रात का…
क़ाफ़िर था, ख़ुदा भी था…
इश्क़ किया नहीं यूँ ही मैंने,
हाल-ए-दिल मेहरबान भी था !!!

तू साहिल मेरी कश्ती का,
तुझसे एहसास तसल्ली का…
तू समंदर है,
मैं नदिया सी तुझमें समाऊँ…
तू पंछी,
मैं परवाज़ बन जाऊँ…
तू दुआ,
तू रहनुमा मेरा…
मेहरम था, मरहम भी था…
इश्क़ किया नहीं यूँ ही मैंने,
हाल-ए-दिल मेहरबान भी था !!

#रshmi

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तुमसे मिलूँगी….

मैं तुमसे कहीं फिर मिलूँगी…
जाने कब और कहाँ मिलूँगी,
याद करना मुझे जहाँ हो,
शायद इंतज़ार में वहीं मिलूँगी…

जा रही हूँ मैं जाने दो,
मुझे यूँ प्यार से ना रोको…
दीवाने हो ना जाना देखो,
ज़िद्द को दिल की मना के रक्खो…
वरना मैं तुमसे नहीं मिलूँगी!!

कहते हो इश्क़ करते हो,
ज़रा संभल कर पैर रक्खो…
मस्ती में खो ना जाना देखो,
दिल को अभी और धड़कने दो….
मैं तुुुमसे यहीं फिर मिलूँगी…

प्यार है तो साबित करो,
दुआओं को आज़ाद रक्खो…
साँसों को थोड़ा और मचलने दो..
कश्ती को अपनी किनारे पे रक्खो…
फिर शायद मैं ऐतबार करूँगी !!

#रshmi

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हम बौने ही अच्छे भईया…

हम नहीं कर पाएँगे दिखावा, ओ भईया!
हम नहीं बन पाएँगे खजूर सी ऊँची छँईया…
ले जाओ ये सामान अपना खजूर उगाने का,
हम नहीं मचा पाएँगे ये बेबुनियादी हल्ला…

लगता तो होगा गिरगिट सा तुम्हें हर बदन, मेरा भी,
पर तुम्हें ही मुब़ारक ये नज़र का पतन, तेरा ही…
चाहो तो ले आना संदेसा फिर से, पर फूल ही मुझे प्रिय हैं…
पौधे हैं हम, बौने ही अच्छे भईया!

देखो मुझमें ये एक ऐब ज़रूर है,
जानता हूँ ख़राब है, मग़र मेरा यही काम है…
सोख लेता हूँ उसे भी, जो धूल है,
फिर कैसे दिखावा करूँ मैैं, जो ना मेरा मूल है…
मैं कैसे ऊँचा हो कर अर्श छू लूँ ?
ज़मीं पर उगा हूँ, ज़मीन ही मेरा स्वरूप है…             जल पीता, धूप खाता हूँ, मग़र ख़ूशबू फैलाता हूँ…     तप-तप कर मैं बौना पौधा, अनुराग का प्रतिबिंब हो जाता हूँ…
गुलाब हैं हम, गुलाबी ही अच्छे भईया !
हम नहीं बन पाएँगे खजूर सी ऊँची छँईया !!

#रshmi

 

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Some stories remain untold and you become story teller !!

BikhreKhayaal

I recall when I started writing, it was never a passion to me or I never knew that I was a writer in disguise or say a scribbler.. Ha Ha!

 It all happened by chance, one fine evening of 2004’s winter when I saw a child distributing news papers in my colony, he was hardly 10 years old, didn’t even have a sweater to cover his body nor shoes to keep his feet warm, thought entire remaining day about him; and from that day it became a chain of days, he used to daily come to circulate those papers in the evening. I used to wonder, why in the evening and most importantly why ‘He (a child)’. I was a student of 11th standard then, exams were approaching and I started writing an imaginary article about that news paper wala, without caring for the exams.Well, I wasn’t a type of student…

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नई द्रौपदी…

उस दिन जब मैं रोई थी, पूरी रात नहीं सोई थी..
दर्द नहीं था ये किसी की जुदाई का,
मैं तो दर्द देखकर ‘नई द्रौपदी’ का रोई थी…

इस बार यह कौरवों की आखेट नहीं है..
यहां महाभारत का कोई रण-नाद नहीं है..
द्रौपदी इस बार तेज़ाब से जल रही है..
परन्तु यह ‘नया महाभारत’ अकेली लड़ रही है…

इस बार यह पांचाली नहीं है..
परन्तु पीड़ा का आभास वही है..
द्रौपदी के चीर तो वो अब भी हर लेता है,
परन्तु चुरा कर वस्त्र उसके,
दुशासन उसे ही चरित्रहीन कहता है…
क्यों द्रौपदी सब कुछ सहती है, क्यों नहीं कुछ कहती है?
अपनेपन का जो ढ़िंढ़ोरे पिटते हैं, उन्हीं पापियों का पाखंड़ झेलती है…
वहाँ तो माधव आए थे, इस युग में वो ना आएँगे..
अब कोई अलौकिक रूप ना दिखाएँगे..
इसी विचार में खोई थी,
ये रीति देखकर रोई थी !!

इस बार जब उसने भी कमर कस ली थी,
बचाने अपना अस्तित्व चल निकली थी…
तब भी ‘संस्कारों के कहे में’ आ गई,
वो नीति-अनीति के ज्ञान में पली-बढ़ी थी…
दुशासनों का हरण दोहरा नहीं पाई थी,
उसे उनकी करतूतों पर शर्म आई थी..

कैसे नियम तुम मुझे पढ़ाते हो,
इन अत्याचारियों की लाज बचाते हो?
जगत व्यवहार से ये पूछने निकली थी,
अपना संग्राम स्वयं ही लड़ने निकली थी…

लड़ने लगी है अब वो बढ़कर,
माधव की संगामी बनकर…
अब बल है भुजाओं के बाहर-भीतर,
बलशाली नहीं अब दुशासन केवल…
अब ना कहलाती वो ‘नारी बेचारी’,
कहना हो तो कहो इसे तुम महाभारी…

मोहन के इंतज़ार में अब शक्ति नहीं,
ये सोचकर निकली थी,
मोहन ख़ुद ही बनकर निकली थी…

अपने शत्रु को परास्त करने निकली,
दुशासन की पोल खोलने निकली थी…
कहाँ थे अब तक ये सब भुजबल,
क्यों ना उठकर चीखी थी?
ये कैसी भ्रम की कृति थी,
क्यों ना अपने हक में बोली?

मृदुलता के निर्माताओं को सोच कर,
कोमलता के पक्षधरों को विचार कर…
ये अनीति देखकर रोई थी..
दर्द नहीं था ये किसी की जुदाई का,
मैं तो दर्द देखकर ‘नई द्रौपदी’ का रोई थी !!

#रshmi

 

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कवि हूँ…

आभासों और भावनाओं से भरा हूँ,
कवि हूँ, संभावनाओं से भरा हूँ…

दुख और व्यथाओं से भरा हूँ,
कवि हूँ, अत्याचारों से भरा हूँ…

वेदना और अवहेलनाओं से भरा हूँ,
कवि हूँ, संवेदनाओं से भरा हूँ…

हँसी और हास्य से भरा हूँ,
कवि हूँ, मुस्कानों से भरा हूँ…

शब्दों और परिभाषाओं से भरा हूँ,
कवि हूँ, मुक्त विचारों से भरा हूँ…

आँसू और वीरहाघातों से भरा हूँ,
कवि हूँ, गहरे घावों से भरा हूँ…

कला और कल्पनाओं से भरा हूँ,
कवि हूँ, अभावों से भरा हूँ…

प्रीति और अपनत्व के इंकलाब से भरा हूँ,
कवि हूँ, नफ़रतों के सरोकार से भरा हूँ…

उपलब्धता और सहजता के स्वभाव से भरा हूँ,
कवि हूँ, कविताओं के आसमान से भरा हूँ !!

#रshmi

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एक ख़्याल को क़ुरेदते रहे, उसकी बदखती तक.. हलक़ में अटके एहसास ख़ुद-ब-ख़ुद कविता हो गए !! #रshmi
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The Seed of Spirituality…

Well, Judgement is not his cup of tea, if he didn’t judge anyone in his entire life. Oh! You believe he is beyond life… Okay! Now let me come to the point.

Well, ‘Belief’ itself is one more reason for not believing him..

Can you just follow a race of horses (all of same color) who are running at a same speed, none of them shall be a winner or a loser at the same point of time, all of them reach the finishing line at the same time (nobody is a follower, basically)?

Exactly! No, Right?

But I was the same horse running the same race for no different conclusion. I was like, ‘Firm GOD believer’. I might have never believed in him but a thing called ‘Fear’ always stuck behind, pushing me do the same veneration, for what reason, I didn’t know !!

Let me first explain this ‘Fear’…
I have grown up in a culture where everyone be like ‘Morning veneration, Evening Veneration’ and so on… there grew this thing called fear which stated ‘If you didn’t do this or did that, GOD would do something bad to you’.. And I was like, Oh man! There’ll be some mishap if I don’t behave the way which has been stipulated…

Now, let me come to my Oh! Really.. Is GOD so mean? If so, then there is no God.
If he would also behave the way human species is behaving with each other then how come is he GOD?
Well, those were my rebellious counter thoughts to these so called cultural beliefs..

I didn’t stop there.

I knew one more concept of GOD which was again a ‘Hear say’ that If he existed, we could see him.
But wait! There is a twist, they say, we aren’t able to see him because we don’t want to… Fair enough! They are talking about the observers’ effect. 😀

And again a hear say, he exists in our bodies but we aren’t desirous enough to see him because we don’t desire what we don’t lack… Again! I was like…. really!!?? And I was taking lots and lots more coming in the way..
At last, I became a bag of confusion. I mean, obviously… Such vast and different beliefs and their altogether different followings.

One fine day, I dared to vanish all the fear, which was the by product of those beliefs of course! 😀

The day when the seed of spirituality really sprouted in me, earlier I used to believe I was spiritual because I used to do veneration… Lol, a little weird, I know!

Now I am neutral to God’s existence, at this point… In this process as much I could experience was he is and he isn’t at the same time, but for the people who believe in him, let me tell you he isn’t that mean to harm you if you omit worship(s) and to those who don’t believe, he has no structure but you, me and all of us are his parts because we ourselves are the ‘Universe’ in the capacity of our bodies. So yes, we are the lives and lives are the living Almighty.

Life has a duration, similarly the powers in your body!

God is your action to change, change from beliefs to experience. God is knowing that if you, yourselves are the ‘Universe’ then you can’t be mean to yourself.
God has no different body to appear in front of you to discuss your problems or curse you for mishaps, whatsoever the reason may be.

If you say that he exists in the good and not bad, I would say it is also a belief because as per ‘Mahabharata’ also, there was a war against the wrong, but ‘WAR’ happened. So it depends what is good for one, may be bad for another.

So, on the judgement day if I will have to answer I would say, luckily without fear that I didn’t believe him because he was made of beliefs..
And that space in the final time is the reality, reality is that Space where there is no choice or confusion, but acceptance. And belief is a choice not acceptance.

PS: None has to answer the authenticity of being themselves!

#रshmi

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Two Faces..

BikhreKhayaal

In this world saying goes ‘Good people bring out the good in you’ and when they bring it out you are the very new and a changed person from what you used to be.

But what if people bring out the bad in you? Then also you become very changed from what you have been. Is it so, that ‘Bad people bring out the bad in you’ or you have dropped yourself down to that level to be bad and mad?

Sometimes I come across such situations where it becomes difficult for me to understand whether to follow my heart and instincts or to flow with the waves of unacceptable or I should be using the word ‘Wrong (for myself)’? I sense, I am a kind of person who can’t “Swallow the bee, happily”. Situations arise when you feel like battling inside with yourself and with the outer forces and…

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